रोना आया

हम को तो गर्दिश-ए-हालात पे रोना आया
रोने वाले तुझे किस बात पे रोना आया

कैसे मर-मर के गुज़ारी है तुम्हें क्या मालूम
रात भर तारों भरी रात पे रोना आया

कितने बेताब थे रिम झिम में पिएँगे लेकिन
आई बरसात तो बरसात पे रोना आया

कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

‘सैफ’ ये दिन तो क़यामत कि तरह गुज़रा है
जाने क्या बात थी हर बात पे रोना आया

– सैफुद्दीन सैफ

4 Comments

  1. कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
    सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

    छू जाने वाली कविता

    Like

  2. सैफुद्दीन सैफ साः का यह कलाम मेरा पसंदीदा है, आभार.

    Like

  3. mehhekk says:

    कौन रोता है किसी और के गम कि खातिर
    सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

    wah bahut hi badhiya

    Like

  4. Thanks for posting it here

    and that too with author’s name.

    Thanks once again.

    Like

Leave a Comment

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s