पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||

वो तेरा नजरे मिलाना और पलकें झुकाना याद है मुझे |
वो तेरा सब कुछ समझना और बच के निकलना याद है मुझे ||
मेरा आङों से तकना और तेरी नजरों का मुझको पकङना,
वो भरी दुपहरी छतों पे फिरना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

वो तेरी गलियों में मेरा भटकना याद है मुझे |
वो उन्हीं राहों से फिर फिर गुजरना याद है मुझे |
तेरी एक झलक को वो घन्टों नुक्कङ पे ठहरना,
फिर सब से बच बच के तुझको तकना याद है मुझे |

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

मेरे कहने से पहले तेरा सब कुछ समझना याद है मुझे |
मेरे इजहार-ए-मोहब्बत से तेरा हर पल डरना याद है मुझे |
तेरे खतों का वो लम्बा इंतजार,
और चन्द अलफ़ाज़ों में तेरा बहुत कुछ लिखना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |

मेरी हर बात पे तेरा खिलखिला के हसना याद है मुझे |
इजहार करके तेरा खुद से ही बचना याद है मुझे |
अपनी तारीफ सुनकर तेरा वो शरमाना,
मेरे हर सवाल पे वो तेरा बाते बदलना याद है मुझे ||

बहुत भुलाना चाहा, बहुत कुछ भुलाया, पर अब भी बहुत कुछ याद है मुझे |
वो इश्क की राहों में पहले कदम, उन कदमों पे लङखङाना और संभलना याद है मुझे ||

– गौरव संगतानी

(अभी और बहुत कुछ याद है मुझे…)

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