तुझे नही….!

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
ढूँढता हूँ उस शख्स को, जिसे तूने कभी चाहा था |
अपने वादे न निभा पाया, उस गुनाहगार को ढूँढता हूँ |

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |

ढूँढता हूँ उन लम्हों को, जब करीब थे हम दोनो |
ढूँढता हूँ उन लब्जोँ को, जिन्हे उम्मीद थी मुझमें |
जिन पर साथ चले थे, उन राहों को ढूँढता हूँ |
बाँटी थी जो बातेँ, उन बातों को ढूँढता हूँ |

तुझे नहीं मैं खुद को ढूँढता हूँ |
उजालो से डर लगता है, अंधेरों को ढूँढता हूँ |
– गौरव संगतानी

6 Comments

  1. बहुत बढ़िया.

    चंद्रबिन्दु को बिन्दु की जगह इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे जरा देखें. बारहा में ~M से चंद्रबिन्दु और M से बिन्दु लगता है.

    उदाहरण के लिये: आपने लिखा है उजालोँ यानि ujaalo~M

    -इसे होना चाहिये उजालों यानि ujaaloM

    –सुझाव है, अन्यथा न लिजियेगा.

    आप में बहुत संभावनायें हैं. लिखते रहें.

    अनेकों शुभकामनायें.

    Like

  2. divyabh says:

    बहुत ही शानदार कविता…
    सच लिखा है… तलाश तो खुद का ही किया जाता है दूसरे अस्तित्व में भी…
    यही तो जिज्ञासा बन जाती है,,, एक खुशी की तलाश!!!

    Like

  3. PARUL says:

    bahut khuub……

    Like

  4. बहुत सुन्दर…

    Like

  5. khucee says:

    कविता अच्छी है। लेकिन थोड़ा कनफ्यूजन है।

    Like

  6. Manmohan says:

    Arey Waah..!!!
    Kya khoob likha hai aapne. Bahut sunder.

    Likhte rahiye

    S-sneh
    Manmohan

    Like

Leave a Reply to khucee Cancel reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s