समझे नहीं जो खामोशी मेरी,
मेरे लब्जों को क्या समझेंगे |

बचते रहे उम्र भर साये से मेरे,
मेरे जख्मों को क्या समझेंगे |

भूल जाना यूँ तो नहीं है, रवायत मोहब्बत की |

समझे नहीं जो हालात मेरे,
इन रस्मों को क्या समझेंगे |

– गौरव संगतानी

 

4 Responses to समझे नहीं जो खामोशी मेरी

  1. गहरी बात कह रहे हैं.

  2. balkishan says:

    क्या पंक्तिया लिखी है. गहरे अर्थ समेटे हुए है. लेकिन ये क्या की शुरू हुए नही और ख़त्म.

  3. paramjitbali says:

    बहुत बढिया!

  4. vandana says:

    बहुत खूबसूरती से कही है बात..!

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