अभी अभी मैने डेविड डाविदार का नया उपन्यास “दा सॉलिट्यूड ऑफ एंपररर्स” पूरा किया है 

सरल शब्दो में एक कहानी के माध्यम से लेखक ने बहुत कुछ कहने कि कोशिश की है.

शब्द धर्म निरपेक्षता जिसे राजनीतिक दलों ने अपने ढंग से अपने लिए ही प्रयोग किया

कभी वोट बटोरने के लिए और कभी नये गठबंधन  बनाने के लिए,

इस उपन्यास मे कुछ सही अर्थो में दिखता है“The politics has miraculous power of corrupting anything.”

अर्थात “राजनीति मे किसी भी चीज़ को भ्रष्ट करने की जादुई शक्ति है.”धर्म निरपेक्षता के अर्थ को अनर्थ करने के

 बाद अब बारी बेचारे राम की थी. पहले इन्होने किसी की मस्जिद तोड़ी और बदनाम बेचारा राम हुआ,

जिसने अपने पिता की एक इच्छा पर सारे महल छोड़ कर चौदह साल जंगल में काटे,उसने कब चाहा था उसके एक 

मंदिर के लिए इतना ख़ून बहेइतनी नफ़रत फैले. पर मंदिर से ज़्यादा और कुछ पूरा होना था.

आज फिर वही लोग राम से ना जाने किस बात का बदला लेना चाहते हैं अब बारी उस पुल की है 

जिसने कभी असत्य पर सत्य की विजय को पूरा करने के अहम भूमिका निभाई थी,

राम के अस्तित्वा पर ही सवाल उठे हैं और तो और अपनी 

इस लड़ाई मे इन लोगो ने ना जाने क्या क्या कह डाला…. शायद यही सही समय था जब इस उपन्यास की ज़रूरत थी.

पर जिन्हे इसकी ज़रूरत है वो इसे पढ़ेंगे ही नही और पढ़ा भी तो कुछ फ़र्क नहीं पड़ता…. सही कहावत हैं ना कि 

जो सोया है उसे जगाया जा सकता है पर जो जागते हुए सोने का बहाना कर रहा है,

उसे जगाना मुमकिन नहीं.”

तो क्या कोई उम्मीद नहीं है, कोई  एंपरर (Emperor)  अब नही आएगा, इस देश का भाग्य कभी नही जागेगा…..

अगर हम समझ पाएँ इन सब के पीछे कि इन लोगों कि मंशा और बंद कर दें इन्हे देना वोट, राम रहीम के नाम पर,

हिंदी तमिल के नाम पर, आर्य और द्रविड़ के नाम पर तो क्यों होगा ये हंगामा….

अरे भाई ये नेता भी अकलमंद हैं जिस बात पर वोट नहीं मिलता वो बात नहीं करते….

थोड़ा सोचे आप थोड़ा सोचे हम तो शायद बिना किसी एंपरर के ही हमारा भाग्य बदल सकता है….

अरे मैने तो आपका कितना समय बर्बाद कर दिया …. मैं तो बस यूँ ही….

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