चलिए आज चाय की मेज पर बात करते हैं एक कहानी की जो मैने कल ही पढी है, बहुत ही सुँदर…..
अरे ये क्या आपने चाय नहीं उठायी, ठंडी हो जाएगी.
हाँ तो मैं कह रहा था बहुत ही सुँदर कहानी है, कहानी कुछ इस तरह है….

एक दफा गौतम बुद्द एक गाँव से जा रहे थे वो गाँव ब्राहम्णों का गाँव था और वो सब उनसे बहुत नाराज़ थे
उन लोगों ने गौतम बुद्द को जी भर के गालियाँ दी बहुत बुरा भला कहा पर गौतम बुद्द सब कुछ शाँत भाव से सुनते रहे
जब वो लोग चुप हो गये तो गौतम बुद्द बोले
“यदि आप सब कह चुके तो मैं चलना चाहूँगा यदि नहीं तो मैं तो रुक सकता हूँ”

इस पर एक व्यक्ति बोला
“तुम जानते हो हम तुम्हे क्या बोल रहे हैं तुम पलट कर कुछ क्यों नहीं बोलते”

गौतम बुद्द बोले “तुमने थोङी देर कर दी मेरे भाई
यही सब तुमने अगर दस साल पहले कहा होता तो यहाँ कोई जीवित नहीं बचता
अब मैं तुमसे एक प्रश्न पूछता हूँ
इससे पहले हम एक गाँव में गये थे वहाँ लोग हमारे लिए मिठाईयाँ और फल लाए थे चूँकि हम दिन में एक दफा ही भोजन करते हैं
और हम लोग भोजन कर चुके थे और हम अपने साथ कुछ नहीं रखते हम वो भोजन स्वीकार नहीं कर पाए और सप्रेम लौटा दिया
आप को क्या लगता है उन्होने उस भोजन का क्या किया होगा”

एक व्यक्ति बोला “इसमें क्या रहस्य की बात है उन्होने आपस में बाँट लिया होगा”

गौतम बुद्द बोले
“बस यही दुख है मैंने तुम्हारी गालियों और घृणा को भी आज स्वीकार नहीं किया
तुम इसका क्या करोगे अपने बीबी, बच्चों और पडोसियों में बाँट दोगे”

 

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