एक क्षणिका….!

जाते हुए दिन ने शाम से बस इतना ही कहा
‘अब भी उदास बैठा है वो,
न जाने किस गम को दबाए बैठा है वो |

उगते हुए सूरज की किरणें,
पँछियों की चहचहाहट,
खिलते हुए फूल,
सुबह की चाय की चुस्की,
स्कूल जाते बच्चों का शोर,
धान कूटती औरतों की गप्पें,
तंदूर से आती मकई की रोटी की महक,
शाम की चाय मठरी के साथ,
सब बर्बाद…!
अब भी उदास बैठा है वो,
न जाने किस गम को दबाए बैठा है वो |’
जाते हुए दिन ने शाम से बस इतना ही कहा

– गौरव संगतानी

 

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